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जालौर दुर्ग के बारे में About Jalore Fort


जालौर दुर्ग (जालौर) About Jalore Fort



जालौर दुर्ग (जालौर)About Jalore Fort


जालौर दुर्ग पश्चिमी राजस्थान का सबसे प्राचीन व सुदृढ दुर्ग हैं जिसके बारें मे हसन निजामी ने कहा कि ' ' यह ऐसा किला है जिसका दरवाजा कोई भी आक्रमणकारी नहीं खोल सका । 

" इस दुर्ग का निर्माण हीरांचन्द ओझा के अनुसार, ' परमार शासक धारावर्ष ' (दसवीं शताब्दी में इस दुर्ग पुनर्निमृणि धारावर्ष परमार ने करवाया था ।)

 ने जबकि डॉ. दशरथ शर्मा के अनुसार, ' प्रतिहार नरेश नागभटूट प्रथम ‘ ने जालौर को अपनी राजधानी बनाया और सूकडी नदी के किनारे " सोनगिरि पर्वत पर 
राजस्थान-गुज़रात सीमा  पर इस किले का निर्माण करवाया इसी कारण इसै सौनंगिरी / सुवर्णणिरी सौनलगढ़ दुर्ग  कहा जाता है । 

यहाँ पर पहले जाबात्ति ऋषि तपस्या करते थे

 , इसी कारण इसे जस्तालिपुर के नाम सै भी जाना -जाता है । 


इस किले के साथ "कान्हड़देव स्रोनगरां" के पराक्रम व वीरता का अध्याय जुड़ा है । यहॉ 1311 में रअलाउद्दीन खिलजी व कान्हड़देव सोनगरा के मध्य युद्ध हुआ,

 इस युद्ध "में अलाउद्दीन खिलजी विजयी हुआ । इस युद्ध का विस्तृत वर्णन क्रविपदृमऩाभ द्वारा रचित " कान्हड़देव प्रबंध मेँ मिलता है । 

इसके के बाद अस्वाउद्दीन. खिलजी ने जालौर दुर्ग का नाम  जलालाबाद कर दिया ।

 इस दुर्ग में राजा भोज परमार ने एक संस्कृत पाठशाला का निर्माण 'करवाया जिसे अलाउद्दीन खिलजीद्वारा मस्जिद में परिवर्तित कर दिया गया 

 कालान्तर में इसे तोपखाना मस्जिद / अल्लाउद्दीन खिलजी मस्जिद कहा"जाने लगा, तो इस दुर्ग में स्थित ' झालर' और " सोहन ' बावड्री अपने मीठे पानी के लिए प्रसिद्ध हैं । 

इस दुर्ग में 'संत पीर मलिक शाह की  दरगाह' , चामुण्डामाता, जोगमता  का मंदिर है 

 तो परमास्कालीन कीर्ति स्तम्भ भी यहीं स्थित है । 


★★★★★नाहरगढ़ दुर्ग (आमेर, जयपुर) ★★★★★


नाहरगढ़ दुर्ग का मूल व प्राचीन नाम " सुदर्शनगढ़  सुत्नक्षगादुर्ग ' था ।

 इस दुर्ग का निर्माण जयसिंह ने 1734 (अठाहरवीं शताब्दी ) में मराठों के विरुद्ध रक्षा के लिए करवाया था 

तो इस दुर्ग का पूर्ण निर्माण व बर्तमान स्वरूप सवाई जयसिंह द्वारा  1867 ईं . में दिया गया । 

इस दुर्ग का नाम् लोकदेवता " नाहरर्सिंह भोमिया' के नाम पर नाहरगढ़ नाम पड़। 

तो यह दुर्ग अरावली पर्वतमाला में जयपुर के मुकुट के समान दिखाई देता है, हुसी कारण इरहें जयपुर ध्वजगढ़ /जचपुर का मुकुट कहते हैँ । 

"इस दुर्ग. में महाराजा सवाई माधोसिंह द्वितीय द्वारा अपनी  नो पासवानों रानियों के लिए एक जैसे नो महलो  ( इस दुर्ग में बने महलो  में  सोने की  कलम  से काम किया गया है) का निर्माण ' ' विक्टोरिया शेली ' ' मैं करवाया गया, इसी कारण इसे महलों का दुर्ग कहते हैं 

 तो इस दुर्ग का अन्य नाम मिठड़ी-का किला है । 

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